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ज्योतिष चक्र द्वारा मानव रचना

 

ज्योतिष वेद का एक महत्वपूर्ण अंग है। चारों वेदों के गूढ़ार्थों के विधिवत् ज्ञान के लिए वेदांगों में पारंगत होना आवश्यक है। जिस प्रकार हमारे शरीर के प्रमुख छह अंग हैं, वेदों के भी शिक्षा, कल्प, व्याकरण, छन्द, ज्योतिष आदि के यह अंग माने गए हैं। छह वेदांगों में ज्योतिष को नेत्र की तरह उपयोगी अंग माना गया है। प्राचीन मनीषियाें ने अपने संदेशों में स्पष्ट कहा है कि प्रत्येक व्यक्ति को ज्योतिष का ज्ञान होना चाहिए। क्योंकि यह विद्या ही एक ऐसी विद्या है जो व्यक्ति को भूत−भविष्य व वर्तमान के बारे में पूरी जानकारी देती है। मनुष्यों को आने वाले सभी अच्छे−बुरे फलों के बारे में पहले से ही सभी जानकारी हमें नवग्रहों की स्थिति से मिल जाती है। इसलिए इस विद्या को ज्योतिरूपी चक्षु भी कहा जाता है। ग्रहों का असर मानव शरीर की उत्पत्ति पर भी पड़ता है। प्रकृति की उत्पत्ति नवग्रहों से होती है और जब मनुष्य उत्पन्न हो जाता है तो ग्रहों के अंश प्रत्येक मानव शरीर के अंदर रहते हैं।

मानव का शरीर माता के गर्भ में नौ महीने नौ दिन में तैयार होता है और प्रत्येक महीने के सात ग्रह स्वामी होते हैं। राहु−केतु को छोड़कर क्योंकि राहु−केतु छाया ग्रह हैं − ग्रह नहीं। परंतु उस छाया का भी प्रकृति पर प्रभाव पड़ता है। इसलिए इन्हें ग्रहों में शामिल किया गया है।

मनुष्य शरीर की उत्पत्ति − प्रथम महीना जब गर्भ ठहरता है तो उस महीने का स्वामी शुक्र होता है। उस महीने में गर्भ के अंदर केवल वीर्य रहता है और वीर्य का कारक ग्रह शुक्र होता है। शुक्र जल तत्व ग्रह है। इसलिए प्रथम महीने वीर्य में स्थित शुक्राणु स्त्री के डिंबाण में अवस्थित रज से मिलकर एक अंडे का रूप धारण कर लेता है और ठोस हो जाता है। इसीलिए प्रथम महीने गर्भ का पता नहीं चल पाता है।

द्वितीय महीना − द्वितीय महीने का स्वामी मंगल होता है। मंगल अगि् तत्व ग्रह होता है। इसलिए मंगल उस वीर्य रूपी ठोस अंडे को पिघला देता है और यह मांस का लोथड़ा सा बन जाता है। और पित्त तत्व बढ़ जाता है। इसलिए दूसरे महीने में महिलाओं को उल्टी व चक्कर आना शुरू हो जाता है और बेचैनी बढ़ जाती है।

तृतीय महीना − तृतीय महीने का स्वामी बृहस्पति होता है। बृहस्पति जल तत्व ग्रह होता है। बृहस्पति उस मांस के लोथड़े को लड़का या लड़की के रूप में परिवर्तित कर देता है। शरीर के अंदर सबसे पहले गुप्त अंग ही बनते हैं। इसलिए गुप्तअंग में हड्डी नहीं होती है। तीसरे महीने में गर्भ के अंदर जीव पूर्ण बन जाता है। बृहस्पति जल तत्व होने के कारण पित्त प्रवृत्ति को अचानक रोक देता है। और गर्भवती महिला अद्भुत खुशी पैदा होती है।

चौथा महीने − चतुर्थ महीने का स्वामी सूर्य होता है। सूर्य हड्डी का कारक होता है। इसलिए चतुर्थ मास में उस मांस रूपी जीव के अंदर हड्डी बन जाती है और शरीर लगभग पूरा हो जाता है।

पंचम महीना − पंचम महीने का स्वामी चंद्रमा होता है। चंद्रमा जल तत्व ग्र है, इसलिए चंद्रमा उस शरीर के अंदर पानी उत्पन्न कर देता है। जिसे खून के रूप में जाना जाता है। पांचवे महीने में शरीर नसों, मांसपेशियों व नाड़ियों से पूर्ण हो जाता है।

छठा महीना − छठे महीने का स्वामी शनि होता है। इसलिए गर्भ रूपी शरीर में बाल उत्पन्न हो जाते हैं। क्योंकि शनि बालों व सुन्दरता का कारक ग्रह है। इसलिए छठे महीने में मानव की सुन्दरता, कुरुपता, गोरापन या कालापन तैयार हो जाता है। अर्थात शरीर पूर्ण रूप से तैयार हो जाता है।

सप्तम महीना − सातवें महीने का स्वामी बुध होता है। बुध बुद्धि का कारक ग्रह होता है। इसलिए गर्भ के अंदर मानव को पूर्ण रूप से बुद्धि प्राप्त हो जाती है। गर्भ के अंदर बच्चा पूर्ण रूप से हमारी सभी बाताें को समझने लगता है। इसलिए हमें जिस महिला को बच्चा होने वाला होता है उसे पति से अलग कर उसके मायके भेज देते हैं। या उन्हें पवित्र रहने के लिए सचेत कर देते हैं। छह महीने के बाद किसी भी महिला को टीवी पर या अन्य तरीके से अश्लीलता से बचना चाहिए। और अच्छे संस्कार वाले कार्यों में समय व्यतीत करना चाहिए। क्योंकि बच्चा भी वैसी सब बातों को सीख जाता है। सुभद्रा और अभिमन्यु का उदाहरण हमारे सामने है। उन्होंने गर्भ में ही चक्रव्यूह तोड़ना सीख लिया था। इसी प्रकार प्रहलाद भक्त का भी उदाहरण लिया जा सकता है।

अष्टम महीना − अष्टम महीने का स्वामी महिला लग्ेश होता है। वह ग्रह कोई भी हो सकता है। इसलिए अष्टम महीने में बहुत ही सावधानी बरतने की जरूरत है। क्योंकि महीने के स्वामी का पता नहीं होता है। अर्थात सभी के पास अपनी जन्मपत्री नहीं होती है। यदि अष्टम महीने में लग्ेश ग्रह पीड़ित हो जाए तो गर्भपात की संभावना बढ़ जाती है और शिशु की भी मृत्यु हो जाती है। जबकि किसी कारण सप्तम महीने में शिशु जन्म ले ले तो बच जाता है, परंतु अष्टम में नहीं। अष्टम महीना स्वयं से जुड़ा है, स्वयं को कष्ट देता है इसलिए इस मास में जन्मे शिशु के बचने की संभावना नहीं रहती है। इसलिए इस महीने विशेष सावधानी की जरूरत है।

नवम महीना − नवम महीने का स्वामी चन्द्रमा होता है और वह गर्भ के अंदर पेट में इतना पानी पैदा कर देता है कि शिशु आराम से हिल−डुल सके तथा आराम से जन्म ले सके।

दसवां महीना − दसवें महीने का स्वामी सूर्य होता है। सूर्य अगि् तत्व ग्रह है इसलिए पेट के अंदर गर्मी पैदा करके शिशु को माता के शरीर से अलग कर देता है। वह जिन मांस पेशियों में जकड़ा होता है उनसे छूट जाता है और आराम से जन्म ले लेता है। जब शिशु जन्म लेता है। इस प्रकार सातों ग्रहों का इस शरीर को बनाने में विशेष योगदान होता है।

षट चक्र − जैसे−जैसे मानव का शरीर बन रहा होता है तो उसके अंदर अन्य शरीर के पार्ट के साथ−साथ षटचक्रों के रूप में भी ग्रह और देवता इस शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। और भचक्र व मानव शरीर का आपस में सीधा संबंध हो जाता है। अर्थात उस परमात्मा से हमारा सीधा−सीधा संबंध षठचक्रों के माध्यम से हमेशा जुड़ा रहता है।

प्रथम चक्र − मूलाधार चक्र - यह प्रथम चक्र है। यह चक्र मानव शरीर में गुदा के पास होता है। और शरीर का यह अंग स्थान ही पूरे शरीर को संभालता है। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार शनि भचक्र के बाहरी कक्षा का स्वामी होता है और पूरे भचक्र को संभालता है। इस चक्र का स्वामी श्ािन और शनि की दोनों राशियां मकर और कुंभ होती हैं। यदि किसी व्यक्ति का शनि या मकर कुंभ राशि पीड़ित हो तो इस चक्र के माध्यम से शरीर के अंदर रोग उत्पन्न होते हैं और व्यक्ति कष्ट पाता है। इस चक्र का रक्त वर्ण है, इस चक्र की अधिष्ठात्री देवी डाकिनी है। इसके चार व, श, ष, स वर्ण दल हैं। इस चक्र में भगवान शिव के अंश का वास होता है। मुख्यत: गणेश जी की स्थापना मानी जाती है। इसीलिए प्रथम चक्र से संबंध होने के कारण गणेश जी सर्वप्रथम आदरणीय व पूजनीय हैं। अर्थात इस चक्र का शिव संबंध होता है।

प्रत्येक व्यक्ति की जन्मपत्री में शनि और मकर−कुंभ राशि अलग−अलग भाव में होती हैं। पीड़ित ग्रह या राशि जिस भाव में हैं उस भाव में शरीर का जो भी अंग आता है, उस अंग में मूलाधार चक्र के माध्यम से रोग उत्पन्न होगा। पीड़ित होने को विशेषकर अष्टक वर्ग से देखना चाहिए। अष्टकवर्ग में मकर या कुंभ राशि में 21 या 21 से कम बिन्दु हों तो वह निर्बल होती है या शनि अपने भिनाष्टक वर्ग में शून्य या एक बिन्दु हो तो पीड़िता होता है। ऐसे स्थिति में योग कारक होते हुए भी रोग कारक हो जाता है। विशेषकर यदि ताराबल में तीसरी, पांचवीं या सातवीं तारा से संबंध हो जाए तो बहुत ही घातक हो जाता है।

सभी ग्रहों व राशियों को इसी प्रकार देखना चाहिए। जो ग्रह और उसकी राशि पीड़ित होगी तो वह जिस भाव से संबंध बना रहे हैं, उस भाव में जो शरीर का अंग आता है वह अपने चक्र के माध्यम से उस अंग में रोग उत्पन्न करेगा।

द्वितीय चक्र − स्वाधिष्ठान चक्र − यह चक्र लिंग के पास होता है। इस चक्र का स्वामी बृहस्पति धन व मीन राशि होती है बृहस्पति संतान के कारक ग्रह होता है इसलिए संतान की उत्पत्ति में इस चक्र की विशेष भूमिका होती है। यदि बृहस्पति या धनु−मीन राशि पीड़ित हों तो इस चक्र संबंधी समस्या होती है और संतान संबंधी कष्ट या बृहस्पति धनु−मीन राशि जिस भाव से संबंध बनाती हैं उस भाव संबंधी अंग में रोग होता है। इस चक्र का रक्त वर्ण है, इस चक्र की अधिष्ठात्री देवी शाकिनी हैं। इसेके छह ब, भ,म, य, र, ल वर्ण दल हैं। इसमें वालाख्य सिद्ध की स्थिति है।

इस चक्र के स्वामी देवता विष्णु भगवान व विष्णु के अंग होते हैं। इसलिए संतान प्राप्त हेतु गोपाल सहस्त्र नाम का पाठ किया जाता है और शरीर के सुख की प्राप्ति के लिए विष्णु सहस्र नाम का पाठ किया जाता है। आर्युवेद में कहा गया है कि वीर्यवान व्यक्ति ही सुखी जीवन जीता है। विष्णु भगवान के अंदर दोहरा गुण पाया जाता है। विष्णु भगवान पुरुष−स्त्री दोनों रूप धारण कर लेते हैं और मोहनी रूप का किसी को पता भी नहीं चलता है। क्योंकि शरीर के अंदर लिंग और गर्भाश्य दोनों से इसका संबंध रहता है। भगवान शिव एक बार गोपी बनकर बृज में पार्वती के साथ गोपी रास लीला में गये थे और तुरंत ही पहचाने गए अर्थात स्त्रीरूप धारण नहीं कर सकें क्योंकि उनका स्वादिष्टांत चक्र से कोई संबंध नहीं है।

तृतीय चक्र − मणिपूरक चक्र − यह चक्र नाभि के पास होता है। इस चक्र का स्वामी मंगल व मंगल की मेष व वृश्चिक राशि होती है। इस चक्र से शरीर को अगि् प्राप्त होती है तथा भोजन की पाचन क्रिया इसी चक्र पर निर्भर करती है। यदि मंगल या मेष−वृश्चिक राशि पीड़ित हो तो इस चक्र के माध्यम से व्यक्ति को कष्ट या रोग प्राप्त होगा। इस चक्र की अधिष्ठात्री देवी परम धार्मिक लाकिनी देवी हैं इसके दस ड, ढ, ण, त, थ, द, ध, न, प, फ वर्ण दल हैं। जहां रुद्राक्ष सिद्ध लिंग सब प्रकार के मंगलों का दान कर रहे हैं। मंगल या मंगल की राशि पीड़ित होने पर मुख्यत: व्यक्ति की नाभि अपने स्थान से हटी रहती है और इस कारण पाचन क्रिया खराब रहती है। इस चक्र के स्वामी देवता कार्तिकेय भगवान या हनुमान जी हैं।

चतुर्थ चक्र − अनाहत चक्र − यह चक्र हृदय में होता है। इस चक्र का स्वामी ग्रह शुक्र व वृषभ−तुला राशि होती हैं। शुक्र हृदय में निवास करता है। शुक्र प्रेम का कारक ग्रह है, जो व्यक्ति प्रेम से खुश रहते हैं, उन्हें जीवन में इस चक्र संबंधी रोग होने की संभावना नहीं होती है। परंतु यदि शुक्र या उसकी राशि पीड़ित हों तो इस चक्र के माध्यम से हृदय रोग या वृषभ तुला राशि जिस भाव से संबंध बना रही हैं उस भाव के अंग में रोग पैदा होता है। हृदय रोग उन्हीं व्यक्तियों को होता है जो तनावग्रस्त रहते हैं। इसलिए यदि खुश रहने की कोशिश की जाए और जो भगवान ने दिया है उतनी ही लक्ष्मी में गुजारा करने की कोशिश करें तो हृदय रोग से बचा जा सकता है। इस चक्र की स्वामी व देवता लक्ष्मी जी व उसके अंग होते हैं।

इस चक्र की अधिष्ठात्री देवी काकिनी हैं। इसके बारह क, ख, ग, घ, ड., च, छ, ज, झ,ञ्ज, ट, ठ, वर्ण दल हैं। इस अनाहत पद्म में परम तेजस्वी रक्त वर्ण वाण लिंग का अधिष्ठान है। जिसका ध्यान करने से इह लोक और परलोक में शुभफल की प्राप्ति होती है। दूसरे पिनाकी नामक सिद्ध लिंग है।

हनुमान जी राम और सीता जी को इसलिए प्रिय हैं क्योंकि वे मणिपूरक चक्र के माध्यम से विष्णु और लक्ष्मी के बीच में रहते हैं अर्थात विष्णु और लक्ष्मी ही राम व सीता हैं।

पंचम चक्र − विशुद्ध चक्र − यह चक्र कंठ में होता है। इस चक्र का स्वामी ग्रह बुध व मिथुन कन्या राशि होती है। इसलिए बुध वाणी का कारक ग्रह होता है। यदि बुध, मिथुन या कन्या राशि में से कोई पीड़ित हो तो कंठ या शरीर के जिस अंग से यह संबंध बना रहे हैं उस अंग में इस चक्र के द्वारा रोग होता है। इस चक्र का स्वर्ण वर्ण है, इस चक्र की अधिष्ठात्री देवी शाकिनी हैं। इसके षोडश अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, लृ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अ: वर्ण दल हैं।

इस चक्र के स्वामी व देवता विष्णु भगवान व उसके अंग मां सरस्वती होती हैं। इसीलिए किसी भी संगीत कार्य में सर्वप्रथम मां सरस्वती की आराधना की जाती है।

षठ चक्र − आज्ञा चक्र − यह चक्र मस्तिष्क के भौंह के बीच होता है। इस चक्र के सूर्य−चंद्रमा और इनकी राशि सिंह−कर्क राशि स्वामी होती हैं। यदि सूर्य−चन्द्रमा या कर्क−सिंह राशि पीड़ित हो तो इस चक्र के माध्यम से शरीर में रोग पैदा होता है। सूर्य पीड़ित हो तो दूर की रोशनी, चन्द्रमा पीड़ित हो तो नजदीक की रोशनी पीड़ित होती है। सूर्य−चन्द्रमा दोनों पीड़ित हों तो नेत्र रोग के साथ−साथ मष्तिस्क रोग भी होते हैं।

इस चक्र के स्वामी व देवता शिव व पार्वती होते हैं। अर्थात प्रथम व अंतिम दोनों जगह शिव का अधिकार है। इसलिए शिव ही जीवन दाता व मृत्यु दाता है।

हमारे सातों के सात ग्रह पहले शरीर की रचना करते हैं और उसके बाद षडचक्रों के माध्यम से इस शरीर में वास करते हैं। इस प्रकार दो भचक्रों की स्थापना हुई। आकाशीय ब्रह्मांड और दूसरा पिण्डीय ब्रह्मांड दोनों ब्रह्मांडों का आपस में चुम्बकीय भांति हर समय संबंध रहता है। इस संबंध की वजह से ही प्रत्येक ग्रह अपनी महादशा−अंतर्दशा में मनुष्य को उसके कर्मों के आधार पर फल देते हैं।

 
 
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